खेल मन का

सुख- दुख, आशा- निराशा
प्रसन्नता-अवसाद,विजय-पराजय
सम्मान-अपमान,उन्नति-अवन्ती
खेल है सब मन का हमारे
चक्रव्यूह है रचा उसी ने
फैलाया भ्रम है उसी का
खेलने देगे जितना
उतना वो खेलेगा हमसे
जितना उलझेगे उसमे
उलझायेगा वो उतना ही
जो होता कुशल खिलाड़ी
खेल वही मन के खेल से
है जीत वही मन से पाता है।

अनिता