मैं प्रेम की रीत से रंगी नदियाँ हूँ ,
ऊँचे शिखर से उदगम हुआ मेरा ,
इठलाते, लुका-छिपी खेलते हुए ,
बीता अल्हड़ बचपन ,
हिमालय की गोद में ,
मंजिल है जीवन की मेरे ,
सागर में जा समाना है ,
जब जाना मैंने ,
तोड़ के सब मोह के बन्धन ,
दूर बहुत निकल आयी ,
उमंगो से लहराते हुए ,
पड़ाव पार अनेक किये ,
हर बाधा तोड़ ,
प्रेम,उल्लास से भरी ,
प्रिय सागर से मिलने आयी ,
जानते हुए भी सागर से मिलन ,
मेरा नाम , अस्तिव मिटा देगा ,
उत्साह से जा समायी ,
बांह फैला कर प्रेम से ,
आलिंगन उसने मेरा किया ,
प्यार है या स्वार्थ उसका ,
जान ही नहीं पायी ,
रंग उसके रंग कर ,
संग उसके बहती रही ,
विश्वास मगर उसका ,
पा ना सकी वर्षो से ,
नदियाँ होकर भी मैं ,
प्यासी सदा उसके प्रेम की ,
उद्देलित होता जब वो ,
दंभ में भर तेज वेग से ,
लहरों पर बिठा मुझको ,
दूर धकेलता रहता ,
मैं प्रीत की रीत निभाने ,
फिर से आ समा उसी में जाती ,
नियति यही है मेरी ,
दो पुरुषों के संग से ,
सृष्टि का सृजन नहीं ,
विध्वंस सृष्टि का होता है ,
मैं नारी सा धैर्य धारण कर ,
पुरुषत्व निंद्रा में रख ,
स्त्रीत्व जगाये अपना ,
सम्पूर्ण उसे करती रहती ,
उसके सृजन में सहयोग दें ,
पालन सृजन का मैं करती ,
पुरुषत्व के अहं को उसके ,
संतुष्ट करा जीतने देती ,
नई हवा मुझें बुद्धिहीन ,
शक्तिहीन समझें चाहें ,
सोच पुरातन समझे मेरी ,
मेरे प्रिय की हार में मेरी हार है ,
उसकी जीत में मेरी भी जीत है ,
मैं हार के भी जीत जाती हूँ ,
वो जीत के भी हार जाता है ,
क्यो कि धैर्य के साथ ,
संवारना मुझें सृजन को है ,
सूरज की किरणों से तप कर ,
बादल में छिप बूंदें बन कर ,
मैं बरस जाती हूँ ,
नदियाँ फिर से बन ,
सागर में जाकर मिलती हूँ ,
पूर्ण उसे कर ,
आकार महासागर का देती हूँ ,
क्योंकि मैं ,
मैं प्रेम ,प्रीत की रीत से रंगी ,
नदियाँ हूँ ,हाँ मैं नदियाँ हूँ ।
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–अनिता शर्मा ✍