दादी का गाँव👵

[ यादों के झरोखे से- 2    🌷दादी माँ का गाँव🏚
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यह रचना मेरे बचपन की स्मृतियों  से  सम्बन्धित है।
होली, दीपावली व गर्मी की छुट्टियों में 14 साल की उम्र तक मेरा मम्मी- पापा , भाई-बहन व चाचाजी के साथ गांव जाना होता था।छोटा सा गांव जहाँ दादी पापा के दो चाचाजी और छोटी बुआ के साथ रहा करती थी, पापा के पिताजी का देहांत जब मैं दो साल की थी तब हो गया था। ]

जीवन जब तक सादा था
जीवन उतना ही अच्छा था ।
स्वप्न सा लगता बीता कल
जीवन की कहानी के पात्र
कुछ निभा कर चले गये
कुछ निभा कर ,जाने की है तैयारी में
कुछ निभा रहे हैं अपना पात्र  ।
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शहर से गांव जाना भाता कहाँ था
रम जाते थे फिर भी जाकर
छोटा सा नहर से घिरा गांव
कच्चे, पक्के घर
एक गुवाड़ी छ परिवार
साठ के करीब लोगों वाली
दूर के और करीब के रिश्तों से बनी
दो प्रवेशद्वार, दो निकासदार
निकासदार के बाहर बाडे
बाडे के आगे दूर तक फैले खेत ।

राजा बाबा *****
👴*****

गांधी जी जैसा चश्मा पहने राजा बाबा
सरल,सीधे,निष्पाप मन के
लोभ,मोह से रहित संत जैसा जीवन जीते
गायों के झुंड सगं कान्हा जैसे लगते
घर की हर गाय -बैल, बछडे-बछिया का नाम था रखा
नाम सुन अपना -अपना आते दौडे थे सब
लगाव अथाह था उनका उनसे
मनकु बछिया की मृत्यु पर रोते देखा बाबा को
दूध दुहते छोटे बाबा
सुनती बात गायें राजा बाबा की
गांव के हर बडे-छोटे भी दिये उपनाम
उसी नाम से थे बुलाते
गाय चरा संध्या को घर जब आते
पोटली भर बेर जंगल से हम बच्चों  के लिए लाते
बच्चों के प्यारे राजा बाबा
मन से सच में थे वो राजा
स्वर्गवास भी था सुंदर
स्वस्थ निरोग थे बाबा
पूनम का दिन था,नये वस्र पहने थे उस दिन
गांव के कुछ लोगों ने छेड़ा
राजा बाबा दूल्हा बन कहाँ चले
दर्शन को विष्णु मंदिर गए थे
प्रसाद व चरणामृत ले ,आँखे मूँदे
प्रतिमा के समक्ष ही बैठे-बैठे ही
बिना कष्ट तन व हमें छोड़ गए ।

छोटे बाबा********
🧓******

सिर पर पगड़ी, कानों  में  मुरकी सोने की
रोबदार आवाज, लंबा कद
महानगर में की कई वर्ष नौकरी
अनुभव था घना जीवन का
परिवार को संभालते मुखिया से
करते स्नेह पिता समान  सभी  बच्चों  से
राजा बाबा से थे छोटे
ध्यान रखते पर बडे भाई  सा
किस्सें कहानी कहने की कला निराली
गुवाडी  के सब छोटे-बड़े
बेटा-बेटी,भाभी,बहुओं के सगं
शाम चबूतरे पर गर्मी के मौसम में    
  सर्दी में अलाव तापते
रात में सब आ जुटते घर के थे अन्दर
राते लम्बी  बाबा की कहानियाँ  छोटी लगती
एक ही कहानी, किस्सें कई बार सुनने की फ़रमाइश
अंदाज निराला बाबा का था
राजा-रानी, चोर -डाकू,भूत-प्रेत, जिन्न
किरदार बहुत से होते
शिक्षा मिलती जो कहानी से
सबको वो समझाते भी
सबसे न्यारे प्यारे  कहानी वाले बाबा थे।

दादी माँ  *****
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स्वर्णिम आभा गौरवर्ण
लहंगा-ओढनी पहने
पैरों में भारी पहने चाँदी के  कड़े
कौतूहल से पूछती
कैसे पहने रहती हो इनको
हँसती थी वो सुन कर
लाड लड़ाती प्यारी दादी माँ
छोटा सा सुंदर कच्चा रसोई घर था उनका
सवेरे नींद खुलती छाछ बिलौने की आवाज़ से
मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू
रसोई के लिपे हुए आंगन से थी आती
जो की किसी इत्र की खुशबू से भी
लगती मुझको थी अच्छी
काठला लाल पत्थर वाला
आटा  गूथने  की कोशिश करती मैं भी उसमें
फूकनी से चूल्हा सुलगाने जिद में
आखों से बहते झर-झर आँसू
दादी  के बनाये
चने के पत्तों का साग
भुनी हुई गर्म शक्करकदी
जौ,ज्वार व बाजरे की
मोटी-मोटी मक्खन वाली रोटी
तवे पर बना साग
धार्मिक अनुष्ठानों व अन्य समारोह में
भोजन के निमन्त्रण पर 
दादी माँ  के सगं जाना
अपना पसंदीदा पकवान
कद्दू की कच्चे आम के साथ बनी सब्जी
मालपुआ भर पेट खाना
स्वाद उसका आज भी
अविस्मरणीय है मुझको ।

याद है आज भी💀💀☠👻
दिन व रात में सुने
भूतों के किस्सें  डराते सोते समय
नींद ना आने पर
दादी माँ सबसे अच्छी लगती
पानी पिलाना व लघुशंका के लिए बाडे में जाना
दादी माँ के ही थे भरोसे
रात में बाहर के दृश्य कल्पनाश्रित हो
बडे भयावह लगते☠☠👹
सियारों की आवाज़ों से सहम जाता था मन
आँखे बंद  कर दादी का हाथ थामे चलती
दादी उस समय किसी वीरागना से कम नहीं  लगती थी।

खेल-कूद ,मस्ती, खरीदारी ***🍬🍬🍦🍭🍦🍬
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सितोलिया ,काँच के रंग बिरंगे कंचे
सरकंडो से बनें चंगे, कपड़ों की बनी गेंद
मिट्टी की गाड़ी, गुडिया ,गिल्ली-डंडा
पेल-दूल , छुपा-छुपाई
सुंदर कितने थे खेल-खिलौने ।

क्या बड़े, क्या छोटे
छत से बाड़े में रखे तूडे के ढेर पर
कूदने की प्रतियोगिता ।

दोपहर के समय
छोटे-बड़े अपने-अपने समूह बना
चंगा-पौ में होते व्यस्त
चाय पीने की होती जब इच्छा
दूध का मिलना होता उस समय
सभी घरों में नामुमकिन
जाने  कैसे दोपहर में उसी समय
ठाकुर बाबा की बकरियां चरते हुए
घर के आस -पास आ जाती थी
शरारत करते चाचा-बुआ और बड़े भाई-बहन
सब मिलकर एक बकरी को पकड ही लेते थे
मुश्किल से ही सही
उस मेहनत  का फल चाय के रूप में मिलता
दादी – बाबा की डाट भी पडती
ठाकुर बाबा को वो बताते तो
हसँ कर रह जाते वो ।

बुआ संग पानी लेने कुएँ पर जाना
कुएँ से पानी निकालना सीखना
दो बरतन सर पर रख लाने की जिद्द करना
संतुलन बना घर तक उन्हें सुरक्षित लाना
बडा साहस का काम था लगता।

चुस्की वाले की टन-टन आवाज़ सुन
दोड़ कर जाना
रगं-बिरंगी चुस्की खरीद कर खाना
बिसायती से रंग-बिरंगे पत्थरों वाली
सुंदर-सुंदर अंगुठियाँ बुआ संग लेना
उन अंगूठीयां से जो खुशी मिलती थी
आज सोने व हीरे से भी नहीं मिलती
बनिया काका की दुकान से
नारंगी की फाके, सफेद-गुलाबी रसगुल्ले
वाली टाफी  जी भर कर खाते ।

बाड़ो में जा कर बबूल के पेड़ों से
मीठा-मीठा रसीला स्वादिष्ट गोंद
ढूंढ-ढूंढ कर खाना
आता याद आज भी है ।

🌷🌷🌷
गुजरा समय
गुजरे लोग
फिर मिलते कहाँ है
कहानी बन
स्मृतियों के सुनहरे पन्नों पर
लिखे जाते है
भावविभोर हो यादों में
बार-बार जियें जाते है ।
   🌷🌷 🌷🌷🌷           अनिता शर्मा ✍

  गुवाड़ी**
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चारदीवारी से घिरा वह स्थान जहाँ कई परिवार अलग-अलग घरों में एक साथ रहते हैं ।
काठला**
*********
पत्थर से बना परात की आकृति वाला बरतन ।
बिसायती***
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महिलाओ के श्रृंगार की सामग्री बेचने वाला ।

चुस्की ****
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कुल्फ़ी, आइसक्रीम  ।

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ठहराव व गतिशीलता

😔
ठहराव
शनैः शनैः
निराशा
शनैः शनैः
उत्साहहीनता
शनैः शनैः
कर्तव्यविमुखता
शनैः शनैः
अवसाद …..
😊
गतिशीलता
शनैःशनैः
आशा
शनैः शनैः
उत्साह
शनैः शनैः
कर्तव्यनिष्ठा
शनैः शनैः
प्रसन्नता ।

         अनिता शर्मा ✍

जिंदगी


बंद मुट्ठी, रेत सी, ये जिंदगी फिसलती गई,
आईने के सामने, बनते संवरते हुए,
ये सूरते बदलती रही ।
बंद मुट्ठी, रेत सी, ये जिंदगी फिसलती गई,
बंद मुट्ठी रेत सी ………
टूट कर जुड़ने,जुड़ के फिर,
टूटने के, दरम्यान ,
ये जिंदगी बिखरती गई।
मृगमरीचिका की तरह,
सपनों के पीछे भागते फिरते हुए
ये जिंदगी गुजरती रही ।
बंद मुट्ठी रेत सी ,ये जिंदगी फिसलती गई ,
बंद मुट्ठी रेत सी ———
संवारा ना उसे, जो है हमको मिला,
ना मिला उसकी तलाश में,
ये जिंदगी भटकती रही।
जीने की चाह, जगा हरेक दिन,
मिटाते रहें हरेक दिन,
ये देख जिंदगी मरती रही ।
बंद मुट्ठी रेत सी, ये जिंदगी फिसलती गई ,
बंद मुट्ठी रेत सी ———-
जुनून मोहब्बत का जो मेरे सीने में है,
वो जुनून तुझमें देखने को,
ये जिंदगी तड़पती रही ।
साथ होकर भी हम,
साथ हो ना सके, ये देखकर,
ये जिंदगी शरमाती रही।
बंद मुट्ठी रेत सी ये जिंदगी फिसलती गई ,
बंद मुट्ठी रेत सी ———–।

अनिता

जिंदगी


बंद मुट्ठी, रेत सी, ये जिंदगी फिसलती गई,
आईने के सामने, बनते संवरते हुए,
ये सूरते बदलती रही ।
बंद मुट्ठी, रेत सी, ये जिंदगी फिसलती गई,
बंद मुट्ठी रेत सी ………
टूट कर जुड़ने,जुड़ के फिर,
टूटने के, दरम्यान ,
ये जिंदगी बिखरती गई।
मृगमरीचिका की तरह,
सपनों के पीछे भागते फिरते हुए
ये जिंदगी गुजरती रही ।
बंद मुट्ठी रेत सी ,ये जिंदगी फिसलती गई ,
बंद मुट्ठी रेत सी ———
संवारा ना उसे, जो है हमको मिला,
ना मिला उसकी तलाश में,
ये जिंदगी भटकती रही।
जीने की चाह, जगा हरेक दिन,
मिटाते रहें हरेक दिन,
ये देख जिंदगी मरती रही ।
बंद मुट्ठी रेत सी, ये जिंदगी फिसलती गई ,
बंद मुट्ठी रेत सी ———-
जुनून मोहब्बत का जो मेरे सीने में है,
वो जुनून तुझमें देखने को,
ये जिंदगी तड़पती रही ।
साथ होकर भी हम,
साथ हो ना सके, ये देखकर,
ये जिंदगी शरमाती रही।
बंद मुट्ठी रेत सी ये जिंदगी फिसलती गई ,
बंद मुट्ठी रेत सी ———–।

अनिता

तपस्या

तपस्या है उनकी
दर्शाने अपने प्रेम को
अनन्त के लिए  प्रेम उपहार की
बगिया में फूलों को महकाने की
तपस्या है हमारी
दर्शाने अपने प्रेम को
अनन्त प्रेम के लिए उपहार की
कागज – स्याही से शब्दों के फूलों को महकाने की ।

                              अनिता शर्मा ✍

तमन्ना

ना आफताब
ना माहताब
ना सितारों भरा फलक
ना ख्वाबों खयालातों की
गुफ़्तगू चाहिए ।

ना कागज के पुलिंदे
ना आलीशान मकान
ना हीरे -मोती
ना सोने -चाँदी के
जेवरात चाहिए ।

तमन्ना है कुछ बड़ी
दिल का तेरे सूकून
लबों पे मुस्कुराहट
तेरा साथ हमसफ़र
ताउम्र चाहिए ।


रूखसत हो दुनिया से उस वक्त
हाथ में तेरा हाथ
सुपुर्दे-ए- खाक पे दो मुट्ठी खाक
मेहबूब मेरे
हाथों से तेरे चाहिए ।

                   अनिता शर्मा ✍

गगन और धरा

गगन को धरा का धरा को गगन का
  अब साथ चाहिए
    जाने किसकी इनको लगी है नजर
दूर रह कर जाने कब से
ये शापित सा जीवन है जिए ।

दूर ही से कब तक देखा करेगे
मिलन होगा क्या इनका भी कभी
झिलमिल तारों की ओढनी गगन की
धरा को मिलेगी भी क्या
दुल्हन की तरह सज
धरा गगन संग जायेगी क्या ।

गगन को धरा का ,धरा को गगन का
अब साथ चाहिए
जाने किसकी इनको लगी है नजर
दूर रह कर जाने कब से
ये शापित सा जीवन है जिए ।

जब -जब वेदना धरा की बढें
शुष्क हृदय विदीर्ण हो जाये है तब
देख होता गगन है तब दुःखी
नेह बरसाता अपना धरा पे
मेह की बूंदों से
धरा पा के नेह खिलती है फूलों के संग ।

गगन को धरा का धरा को गगन का
  अब साथ चाहिए
    जाने किसकी इनको लगी है नजर
दूर रह कर जाने कब से
ये शापित सा जीवन है जिए ।

धरा है सजाये सुंदर संसार
गगन है करे पालना उसकी
  चक्र जीवन का रखे सदा गतिमान
मिलन की आस में दोनों
सृष्टि को जीवन देते हुए
विलग रह जीवन हैं जिए ।

गगन को धरा का धरा को गगन का
अब साथ चाहिए
जाने किसकी इनको लगी है नजर
दूर रह कर जाने कब से
ये शापित सा जीवन है जिए ।

                     अनिता शर्मा ✍

प्रीत

यूँ तो एक उम्र गुजारी है साथ हमने
नई सी लगें हैं प्रीत पुरानी
यूँ ही तो साथ नही हमारा
गुजरे सुख-दुःख की राहों से कई
कैसे तेरी प्रीत का सागर
दिल में समाये रहती हूँ
मैं भी ना जानू
देख तुम्हें
व्यथा मन की
व्याधि तन की 
पल में होती दूर
चाँद देख कुमोदिनी खिलती
देख तुम्हें मैं खिल जाती।

                                  अनिता शर्मा ✍

                                  अनिता शर्मा ✍