अगम्य पथ

कैसे छिपा कर
सबके सामने
अपनो से उनके प्रिय को
छीन ले जाता है
अगम्य पथ पर कौन
हम सभी चल रहें
बढ रहे बेखबर से
हर पल हर क्षण
और पास और पास
अगम्य पथ की और

अनिता

पारखी

पारखी होता तो
परख लेता मुझको
पत्थरों में से ढूंढ लेता
मिट्टी में ना खोने देता
तराश देता जो मुझको
प्यार विश्वास से
काँच ना मिला होता
कोहिनूर तुमने पाया होता।

फितरत

अब ना लडूगी तुझसे
क्योंकि फितरत जितने की
मुझसे है तेरी
झगड़ना चाहती हूँ मगर
आँखे मेरी सुनती ही नहीं
मोती झर-झर बहाने लगती हैं
झगड़ना चाहती हूँ मगर
सांसे मेरी सुनती ही नहीं
जोर से दिल धड़का पहले देती हैं
झगड़ना चाहती हूँ मगर
मन मेरा सुनता ही नहीं
मोह के धागों को तोडता ही नहीं
अब ना लडूगी तुझसे
क्योकि फितरत जीतने की
मुझसे है तेरी ।

प्रार्थना

हम सब तेरे बालक हैं माँ
हमको शरण लगा लेना
हमको शरण लगा लेना माँ
तव चरणों में जगह देना
हम सब——–
कलि काल का असुर धनेरा है
माँ चारों तरफ अंधेरा है
हमको ज्योति दिखला देना
माँ हमको राह बता देना
हम सब————
संसार समुद्र गहरा है माँ
नहीं यहाँ कोई रहवर है
पग पग फैले है भंवर
हमको भंवरों से बचा लेना
हम सब———-
तुम विशवेशवरी हो माता
जगदम्बा तुम ही कहाती हो
कष्टों में घिरे जो बालक तेरे
तु उनके कष्ट मिटा देना
हम सब————
दो हमको आशीष हे माँ
सदा तव चरणों में ध्यान रहे
यावत रहें सूर्य चन्द यहाँ
इस संसार में तेरा गुण गान रहे
हम सब तेरे बालक है माँ
हमको शरण लगा लेना
हमको शरण लगा लेना माँ
तव चरणों में जगह देना ।

काल कौन सा ये आया

हे अभयंकर हे महाकाल
यह बात मुझें बतला दो
कौन सा काल है ये आया
ताडंव क्या ये तेरा है
सृष्टि के संहार का
या आसुरी शाक्ति है कोई
महामारी कोरोना जिसने फैलायी
मृत्यु का है नाच नचाया
या कोई मानवता के विरोधी
दुरूपयोग विज्ञान का कर
विनाश भारी है यह फैलाया
या प्रकृति ने अपने दोहन से हो रुष्ट
अपना रोष दिखाया
अंतिम संस्कार को तरसे अपनो से
लाशों के है अम्बार लगे
अस्थियाँ भी विसर्जित होने का
इंतजार है कर रही
ऐसा समय कभी ना आया
जैसा हम आज देख रहे
सपने में भी ना सोचा था
ऐसा भी हो सकता है
भय कैसा फैला है ये
इंसान-इंसान से ही नहीं
खुद को छूने से भी है डरा
सुने पडे हैं प्रार्थना स्थल
मंद जीवन की गति पडी
थमी भागदौड़ है सबकी
कोहराम भारी है मचा
कैसा डर ये फैला है
हे अभंयकर हे महाकाल
ये बात मुझें बतला दो
कौन सा काल है ये आया
हे अभंयकर हे महाकाल।

-अनिता

सत्य पराजित नहीं

सुना है कि सत्य पराजित नहीं होता है,
परेशान हो सकता है,
पर धर्य को धारण करना होता है,
कोन किसका सहारा,
किसका अवलम्ब,
सहारा जब चुक जाता है,
फिर विशवास कोन जगाये,
धर्य की एक सीमा रेखा भी होती है,
जब धर्य टूटने लगता है,
उसे सबंल किसका है मिलता,
चुक जाता है विश्वास,
टूट जाते हैं सब अवलम्ब,
फिर विश्वास कोन जगाये,
कि सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं,
अटल है विश्वास,
विचलित नहीं है आस,
तब ही कृष्ण का मिलता साथ,
टूट जाते है दुनियां के सब झंझावत,
विजयी हो जाता है सत्य,
मन को फिर से होता है विश्वास
सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं ।

जिंदगी

बन्द मुठी रेत सी
ये जिंदगी फिसलती गई
आईने के सामने बनते सवरते हुऐ
सूरते बदलती रही
बन्द मुठी रेत सी
ये जिंदगी फिसलती गई
टूट कर जुड़ने में
जुड़ के फिर टूटने के दरम्यान
ये जिंदगी बिखरती रही
बन्द मुठी रेत सी
ये जिंदगी फिसलती गई
मृग मरीचिका की तरह
सपनों के पीछे भागते फिरते हुए
ये जिंदगी गुजरती रही
बन्द मुठी रेत सी
ये जिंदगी फिसलती गई
संवारा ना उसे जो मिला
ना मिला उसकी तलाश में
ये जिंदगी भटकती रही
बन्द मुठी रेत सी
ये जिंदगी फिसलती गई
जीने की चाह जगा हरेक दिन
मिटाते रहें हरेक दिन
ये जिंदगी मरती रही
बन्द मुठी रेत सी
ये जिंदगी फिसलती गई
जुनून मोहब्बत का जो सीने में है
वो जुनून तुझमे देखने को
ये जिंदगी तडपती रही
बन्द मुठी रेत सी
ये जिंदगी फिसलती गई
साथ होकर भी हम
साथ ना हो सके यह देख
ये जिंदगी शरमाती रही
बन्द मुठी रेत सी
ये जिंदगी फिसलती गई ।

अनिता