रात में भविष्य की चिंता व योजनाओं के बारे में सोचने की वजह से नींद नहीं आ रही थी।सर के ऊपर दो तकिये रख सोने की कोशिश कर रहा था।
नींद अभी लगी ही थी, कि देखा सामने कृष्ण मन्द- मन्द मुस्कुराते खडे थे,मुझसे बोले ‘वत्स’ क्यो, इतना भार उठाये सो रहे हो?
मैं आश्चर्य के साथ उठ बैठा, उन्हें प्रणाम कर कुछ बोलने वाला ही था, उन्होंने दूसरा प्रश्न पुछा,
‘वत्सʼ कितना निर्माण कर लिया?
मैने कहा,प्रभु निर्माण !
कृष्ण बोले, भविष्य की योजनाओं का `वत्सʼ
मैंने कहा,हाँ प्रभु वो नौकरी में उन्नति,
बच्चों की पढाई, उनकी नौकरी फिर उनकी शादी, पत्नि की तबियत,घर की ई एम आई, फिर रिटायरमेंट के बाद के भविष्य की योजना ओर
‘रुको – रूको वत्स ,
क्यों मुझसे मेरा काम छिन रहें हो, भविष्य की सारी योजनायें तुम ही बना लोगे तो मैं क्या करूँगा ?
मुझसे मेरा काम मत छीनो।’
तभी अलार्म की आवाज़ से नींद खुली, तो देखा
तकिये पलंग के नीचे गिरें पडें थे,सामने दीवार पर लगी तस्वीर में कृष्ण बांसुरी बजाते हुए, मन्द- मन्द मुस्कुरा रहे थे ,मानो मुझसे कह रहे हो, तुम अपना कर्म करो, भविष्य की चिंता करके अपने शरीर ओर आत्मा को क्यो बीमार बना रहे हो, योजनायें बना कर, अपना समय क्यो व्यर्थ कर रहे हो,
आखिर होगा तो वही जो मैं चाहता हूँ ।
बाहर बैठक में रेडियो पर पत्नी जगजीत सिंह
का भजन सुनते हुए ,गुनगुना रही थी ।
हे, कृष्ण गोपाल हरी
हे, दीन दयाल हरी
हे, कृष्ण गोपाल हरी
हे, दीन दयाल हरी…

अनिता शर्मा ✍️