सुख- दुख, आशा- निराशा
प्रसन्नता-अवसाद,विजय-पराजय
सम्मान-अपमान,उन्नति-अवनति
खेल है सब मन का हमारे
चक्रव्यूह है रचा उसी ने
फैलाया भ्रम है उसी का
खेलने देगे जितना
उतना वो खेलेगा हमसे
जितना उलझेगे उसमे
उलझायेगा वो उतना ही
स्थिरबुद्धि होती जिसकी
समझ वही ये है पाता
कुशल खिलाड़ी की तरह
खेल वही मन के खेल से
है जीत वही मन से पाता है।

अनिता शर्मा✍️

  स्थिर बुद्धि का अर्थ–
[दु:खों की प्राप्ति होने पर जिनके मन में उद्वेग नहीं हो ,
सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि:स्पृह है ,
तथा जिसके राग,भय और क्रोध नष्ट हो।]