स्वर्णिम आभा
रत्नों से सुसज्जित मुकुट
सिंह पीठ पर सवार
श्वेत धवल वस्र में
समाती मुझको
ममतामयी माँ की
मूरत वो प्यारी
दिव्य स्वप्न वाली ।
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रे मन मुक्त मुझे कर अब
मुझे, मेरा, मैं से।
सुदूर बादलों से चमकता
दिव्य प्रकाश
कभी पिता समान हाथ बढाता
कभी माँ समान आँचल फैलाता
आकाश से परे
सूदूर अनन्त से आता
काम,क्रोध, मद,लोभ,ईर्ष्या रूपी विकारों
कामनाओं की चादर ओढ़े
विस्मृत कर मानव देह पाने का उद्देश्य
अज्ञान की गहरी निंद्रा में लीन
मुझे चेताता
त्याग निद्रा अब
हर्ष-विषाद,प्रेम-घृणा
आसक्ति-विरक्ति, विजय-पराजय विकारों व कामना रूपी
माया के हरेक बंधन से मुक्त हो
ज्ञान का दीप प्रकाशित कर पहचान मुझे
आ समा मुझमें
जन्म-मृत्यु के चक्र में
फिर से बंधने से पूर्व
जाग्रत हो
अंश हो मेरे ही प्रकाश के
विलीन हो आ मुझमें ही
रे मन मुक्त मुझें कर अब
मुझे, मेरा ,मैं से ।
अनिता शर्मा✍️