जननी ही शक्ति का प्रथम विकासस्वरूप है, और जनक के भाव की अपेक्षा जननी  का भाव ही उच्चतर हैं । ‘ माँ ‘ नाम लेने से ही शक्ति का भाव सर्वशक्तिमता और देवी शक्ति का भाव आ जाता है।
जैसे शिशु अपनी माता को सर्वशक्तिमता समझता है ,अर्थात माँ  सब कुछ कर सकती हैं । वह जगज्जननी भगवती ही हमारी आभ्यन्तरिक निद्रिता कुण्डलिनी हैं।उनकी उपासना किए बिना हम कभी भी अपने को पहचान नहीं सकते ।

सर्वशक्तिमता, सर्वव्यापिता ओर अनंत दया उन्हीं जगज्जननी भगवती के गुण हैं । जगत में जितनी शक्ति हैं, उसकी समष्टि स्वरूपिणी वही हैं। जगत में शक्ति की सभी अभिव्यक्तियाँ माँ ही हैं। वही प्राणरूपणी हैं,वही बुद्धिरूपिणी हैं,वही प्रेमरूपिणी ।

वह समस्त जगत के भीतर विराजमान हैं , फिर भी वह जगत से संपूर्ण पृथक हैं ।
वह एक व्यक्तिरूप हैं, उनको जाना जा सकता हैं व देखा जा सकता हैं। ( जैसे श्री
रामकृष्ण ने उनको जाना और देखा था । ) उन जगन्माता के भाव में प्रतिष्ठित होकर हम जो चाहे कर सकते हैं ।वह तुरंत ही हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देती हैं ।
” हमारी पार्थिव जननी में उन जगन्माता का जो एक कण प्रकाशित रहता हैं, उसी की उपासना से महानता का लाभ होता हैं ।
यदि परम ज्ञान और आनंद चाहते हो तो उस जगज्जननी माता की उपासना करो ” ।

नवरात्रा के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ