सिद्धांतो पर चलना हर युग में ,
माना मुश्किल है, पर नामुमकिन नहीं ।
अफ़सरशाही व्यवस्था का,
कुछ स्वेच्छा से बन हिस्सा,
लालच के दल-दल में डूबें,
कुछ,आत्मन को मार,
चलते सगं उसके,
कुछ, सही ना कर पाने वाले,
कुंठित हैं बनते,
कुछ मजबूरी में हिस्सा बन ,
सही-गलत का खोते विवेक,
आदर्शों, मूल्यों से निर्मित सिद्धांत,
माँ-बाबा के पोषण में घुट्टी बन ,
खून की बूंद-बूंद में बहते,
भौतिक सम्पदा से नहीं ,
सत्कर्मों,सत्कार्यो से ,
अच्छा इंसान बनने की नसीहत ,
मेहनत से हासिल मुकाम को,
सिद्धांतो के लिए छोड़ देना,
कुछ करने की अपार क्षमता को क्षीण कर जीना,
सुरक्षित भविष्य को छोड़ ,
असुरक्षित भविष्य की ओर चलना,
बिरले ही कर पाते हैं ,
राह मे साथ कदम मिलाकर चलने वाला, दिखता नहीं ,
पर दूर कही कुछ ओर भी है जो चल रहें,
अच्छाई व बुराई हर युग में होती ,
अनुपात अलग-अलग,
अनुपात से ही स्वर्ग-नर्क सी बनती दुनिया ,
अच्छाई का अनुपात कम होने पर भी,
अस्तित्व दुनिया का उसी पे है स्थिर ,
हैं दुनिया बदलने की क्षमता उसमें ,
सिद्धांतो पर चलना हर युग में ,
माना मुश्किल है,पर नामुमकिन नहीं ।
अनिता शर्मा ✍