साँझ को कुछ पलों के लिए ,
थम सी जाती है जिंदगी ,
एक मौन सा पसार ,
दबे पांव आती है साँझ ,
भूले बिसरे बिछुड़ो की,
कुछ अपने ओर परायो की,
याद दिला रुला जाती है, साँझ
मैं कौन कैसे ,क्यो
कब से कब तक ,
अगणित प्रश्न छोड़ लौट जाती है ,साँझ
भीड़ में भी अकेले होने का ,
संपूर्णता में शून्यता का ,
शाश्वता में नश्वरता का
एहसास दिला जाती है साँझ,
कुछ खटे मीठे कड़वे से ,
प्रेम से भीगे, दर्द से भरे,
हँसते रोते गुनगुनाते,
दृश्य मानस पटलपर,
उकेर जाती है साँझ ,
प्रकृति के अंश को ,
प्रकृति से कुछ पल मिला,
जिंदगी की हलचल से,
फिर जोड़ जाती है साँझ
-अनिता शर्मा ✍