जीवन की इस दुपहरी में ,
बैठें पल दो पल ,
बरगद की ठंडी घनेरी छांव में ,
साथी हैं बचपन का ये सच्चा हमारा ।
जीवन ने हमको दिया क्या ,
जीवन ने हमसे लिया क्या ,
मैं हिसाब में थोड़ा सा कच्ची हूँ ,
तुम ही लगा लेना ठीक- ठीक से ,
घटाना मुझको आता ही नहीं है ,
मैं आशा से पूरी नदियाँ हूँ गहरी ,
जोड़ ही सब में देती हूँ ।
जीवन की इस———
प्यार कहीं जो खो गया हैं ,
सुलझाते जीवन की उलझनों को ,
भूले जीवन की उलझनों को कुछ पल ,
प्यार भरे उन पलों की यादों को जी ले ,
बरगद की शाखा पकड़ के झूलें हम -तुम ,
दिल में छिपा बचपन हैं जो प्यारा ,
जगा कर हँस ले गा ले संग उसके ।
जीवन की इस———
दुःख-सुख, आशा-निराशा ,
मिलना-बिछड़ना, हँसना-रोना ,
सांसो की डोरी हैं तब तक ,
यूँ ही रहेंगे संग-संग ,
ये सब तो हैं जीवन की परिभाषा ,
पल जो हो खुशियों से भरे ,
शिकवे-गिले भुला, उनको जी ले जी भर ।
जीवन की इस——-
अनिता शर्मा ✍