मैला मुझकों ,
तुम अब ,
ना करना ,
ना करना ।
मैं माँ गंगा ,
कहती अब ,
संतानों से अपनी ,
मत बोझा मुझ पर डालों ,
असमर्थ हो रही अब मैं ,
संचित पाप तुम्हारे धोने ,
मोक्षदायनी कहलाने में ,
आँचल देखा माँ का ,
चेतन हो कभी तुमने ,
मटमैला ,
जीर्ण-शीर्ण ,
रूखा-सूखा ,
स्वार्थ की दृष्टि तुम्हारी ,
देख कहाँ पायेगी,
तन -मन विदीर्ण,
हारा हुआ ,
औधोगिक विकास,
अंधाधुंध निर्माण,
जगंलो का ,
पहाडों का दोहन ,
तुम्हारी ना मिटने वाली भूख से ,
प्रकृति के असंतुलन ने ,
रूप कैसा छिन्न-भिन्न,
मेरा हैं किया ,
विरासत क्या मैं दूँगी ,
भावी पीढ़ी को ,
माँ के प्रति श्रद्धा हैं ,
तुम्हारी तो ,
इतना अब तुम कर लेना ,
जगा चेतना अपनी ,
पश्चाताप की अग्नि में जल ,
पापों से मुक्त ,
मोक्ष की कामना ,
स्वयं ईश्वर से कर लेना ,
माँ हूँ ,
तुम्हारी भाँति,
निष्ठुर नहीं हो सकती ,
हाँ , सदियों चली परम्परा को ,
प्रतीक रूप में कर लेना ,
अस्थि फूलों को चुन ,
कच्चें मिट्टी के बर्तन में रख ,
पावन जल मेरा भर देना ,
अंतिम यात्रा स्थल पर ही ,
धरती के आँचल में ,
समाहित कर देना ,
रखना श्रद्धा ,
माँ हूँ ,
मैं बहती हर जगह ,
धरती के तल में ,
पाप तुम्हारे हर मैं लूंगी ।
मैला मुझकों ,
तुम अब ,
ना करना ,
ना करना |
अनिता शर्मा ✍