शब्द कितने ही
निशब्द हो गए
भाव निश्चल
प्रेम घारा से पोषित
वंचित लेखनी के संयोग से
यथार्थ के शुष्क
घरातल पर
विलीन हो
मस्तिष्क पटल पर ही
शून्य  हो गए …..
                    नीलकिरण✍️