खेल मन का

सुख- दुख, आशा- निराशा
प्रसन्नता-अवसाद,विजय-पराजय
सम्मान-अपमान,उन्नति-अवनति
खेल है सब मन का हमारे
चक्रव्यूह है रचा उसी ने
फैलाया भ्रम है उसी का
खेलने देगे जितना
उतना वो खेलेगा हमसे
जितना उलझेगे उसमे
उलझायेगा वो उतना ही
स्थिरबुद्धि होती जिसकी
समझ वही ये है पाता
कुशल खिलाड़ी की तरह
खेल वही मन के खेल से
है जीत वही मन से पाता है।

अनिता शर्मा✍️

  स्थिर बुद्धि का अर्थ–
[दु:खों की प्राप्ति होने पर जिनके मन में उद्वेग नहीं हो ,
सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि:स्पृह है ,
तथा जिसके राग,भय और क्रोध नष्ट हो।]

मानवता अभी जिन्दा हैं


केरल में कुछ दिन पूर्व एक गर्भवती हथिनी के साथ जो अमानवीय व्यवहार हुआ, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया।मन बडा ही बेचैन था। मुझें ऐसा लगा मानो मानवता हमारे समाज से लुप्त हो रही है।हमारा समाज प्रकृति ओर जीव जन्तुओ के प्रति असंवेदनशील होता जा रहा है ।
परन्तु कल की एक घटना ने मुझें गलत साबित कर दिया, कि मानवता हमारे समाज से लुप्त हो रही है ।कुछ लोग इसके अपवाद हो सकते है, मगर अभी भी संवेदनशील लोग हमारे समाज में है, जो आज की भागदोड़ वाली जीवनचर्या में भी अपना समय किसी बेजुबान निरीह पक्षी की मदद करने में दे सकते हैं, उनके दर्द को बिना बोले समझ उनकी मदद कर सकते हैं ।इस सत्य घटना को मैं आप के साथ साझा करना चाहती हूँ ।
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कल सुबह नौ बजे की बात है मैं रसोई में अपने कार्य में व्यस्त थी,तभी फोन की घंटी बजी, मैंने फोन उठाया, फोन पर मेरे घर के सामने रहने वाली मेरी मित्र सीमा थी।उसने मुझसे उसके घर के बाहर रखें दूध को मेरे फ्रीज में रखने को कहा और तुरंत फोन रख दिया।हम दोनों के यहाँ एक ही व्यक्ति दूध के पैकेट देने आता है ।
सुबह ग्यारह बजे जब दरवाजे पर घंटी बजी तो मैंने दरवाजा खोला।सामने सीमा खड़ी थी मैंने उससे पूछा आज सुबह-सुबह इतना जल्दी तुम कहां चली गई थी? तो उसने मुझे बताया कि वह अपनी दवा लेने मेडिकल स्टोर गई थी। जब वह स्कूटर से मेडिकल स्टोर जा रही थी,तो उसने देखा सड़क के बीच में एक टिटहरी पंख फैलाए गिरी हुई है।उसने सोचा कि शायद किसी वाहन के नीचे आने के कारण उसे चोट लगी है।उसने स्कूटर रोक कर टिटहरी के पास जाकर देखा तो वह खड़ी हो हो गई।सीमा ने देखा कि टिटहरी के पंख के नीचे उसका एक छोटा सा बच्चा है। तभी एक और टिटहरी वहां आ गई, और जोर-जोर से चिल्लाने लगी टिटहरी का बच्चा सड़क के किनारे बारिश के पानी की निकासी के लिए बने नाले के पास जाना चाह रहा था।वह टिटहरी का जोड़ा जो शायद उस बच्चे के माता-पिता थे उसे उस नाले के पास जाने से रोक रहे थे।नाले के ऊपर सीमेंट से बनी हुई मोटी टाइल्स लगी हुई थी, उसके ऊपर छोटे-छोटे छेद थे। सीमा को लगा कि अपने बच्चे के साथ नाले को पार करके सामने घने पेड़ों की तरफ जाना चाहती है मगर कहीं वह बच्चा नाले में ना गिर जाए इसलिए वह उसे रोक रही है। सीमा ने उस बच्चे को हाथ से उठाकर नाले के दूसरी ओर आगे जाकर छोड़ दिया। टिटहरी का जोडा भी पीछे-पीछे आ गया। सीमा को लगा कि अब सब ठीक है ,और वह मेडिकल स्टोर चली गई। 15 मिनट बाद वह वापस उसी रास्ते से आ रही थी,तब उसने देखा कि नाले के पास ही टिटहरी का जोड़ा और वह बच्चा है।वो जोर-जोर से शोर कर रहे हैं, और अपने बच्चे को नाले के पास जाने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वह बच्चा अपने माता पिता के पंखों के घेरे से निकल उस नाले के पास आ गया और नाले के ऊपर बने सीमेंट की टाइल के छेद से वह बच्चा नाले में गिर गया। टिटहरी का जोडा जोर-जोर से शोर करने लगा।
अंदर से बच्चे की भी आवाज आ रही थी। सीमा को कुछ समझ नहीं आया कि वह क्या करें सीमेंट की टाइल वह उठा नहीं सकती थी तभी उसने हमारी सोसाइटी के दफ्तर में फोन किया और उन्हें यह सब घटना बताई और मदद के लिए किसी को भेजने को कहा उन्होंने 10 मिनट में एक आदमी को भेजा। उसने नाले के ऊपर लगी सीमेंट की टाइल को हटाया तो देखा कि वहां टिटहरी के दो बच्चे और नाले में गिरे हुए थे।अब सीमा को समझ आया कि वह बच्चा क्यों बार-बार नाले के पास जाने की जिद कर रहा था, क्योंकि उसे उन दोनों बच्चों की आवाज आ रही थी,ओर उसके माता-पिता उसे नाले में गिरने से रोकना चाह रहे थे।अपने तीनों बच्चों को देख टिटहरी का जोड़ा जोर-जोर से शोर करने लगा, मानो वह कह रहे हो कि उनकी मदद करें और उन्हें बाहर निकाल दे। मदद के लिए आए आदमी ने नाले में जाकर तीनों बच्चों को निकालने की कोशिश की मगर वह बच्चे डर कर इधर से उधर भागने लगे और उनको निकाल पाना उस आदमी के लिए असंभव हो गया, तब उसने दो ओर आदमी को फोन करके बुलाया।वह लोग दो जाली लेकर आए और दोनों तरफ जाली लगा कर बच्चों को इधर उधर जाने से रोका।कुछ देर की कोशिश के बाद तीनों बच्चों को उन लोगों ने बाहर निकाल लिया।टिटहरी का जोड़ा बहुत खुश था और उसके बच्चे भी आवाज करते हुए बड़े खुश लग रहे थे। टिटहरी के जोड़े की आवाज में अब शोर नहीं था, मानो वह अपने बच्चों की जान बचाने के लिए धन्यवाद बोल रहे हो, टिटहरी का जोड़ा सीमा के पैरों के पास आकर खड़ा हो गया। ऐसा लगा मानो कि वह छोटा बच्चा अपने दोनों भाई बहनों के लिए ही उस नाली में गिरा था क्योंकि उसे मालूम था कि वह दोनों नीचे गिरे हुए हैं बच्चे का अपने भाई बहनों के लिए प्रेम देखकर समझ आया कि सिर्फ इंसान ही नहीं पक्षी भी एक दूसरे से प्यार करते हैं और एक दूसरे की सुरक्षा भी करना जानते और चाहते भी हैं।
सीमा से यह सब जान कर मुझे बहुत खुशी हुई। मैं उसकी संवेदनशीलता से बहुत प्रभावित हुई। सीमा से पहले भी वहां से लोग गये होंगे मगर कोई ओर जाग्रत नहीं था।इसी कारण टिटहरी का दर्द उन तक नहीं पहुंचा ।
सीमा की वजह से टिटहरी के तीनों बच्चे सुरक्षित थे।
केरल की घटना से जो मन कुछ दिनों से व्यथित था,आज उसे थोड़ा सुकून मिला, विश्वास हुआ कि मानवता अभी जिन्दा हैं ।

अनिता

कविता हूँ मैं


कविता हूँ, मैं
मानव व प्रकृति के,
हर रगं-रूप का,चित्रण हूँ, मैं
सुख-दुख ,आँसू-हँसी,
निराशा-आशा, शौर्य-भय,
करूणा-पीड़ा, जय-पराजय,
मिलन-वियोग,सृजन-विनाश,
सुन्दर-बदसूरत, जीवन-मृत्यु ,
जीवन के हर पहलू को ,
दर्शाने वाला आईना हूँ।
मैं बुद्धि के तर्क से ज्यादा,
कोमल भावुक मन की,
गहरी अभिव्यक्ति हूँ ,
मैं संसार के यथार्थ के साथ ही,
सुन्दर काल्पनिक संसार को दर्शाती हूँ,
कविता हूँ मैं,
मानव व प्रकृति के,
हर रंग- रूप का चित्रण हूँ मैं ।

अनिता

भविष्य की योजना (कहानी)


रात में भविष्य की चिंता व योजनाओं के बारे में सोचने की वजह से नींद नहीं आ रही थी।सर के ऊपर दो तकिये रख सोने की कोशिश कर रहा था।
नींद अभी लगी ही थी, कि देखा सामने कृष्ण मन्द- मन्द मुस्कुराते खडे थे,मुझसे बोले ‘वत्स’ क्यो, इतना भार उठाये सो रहे हो?
मैं आश्चर्य के साथ उठ बैठा, उन्हें प्रणाम कर कुछ बोलने वाला ही था, उन्होंने दूसरा प्रश्न पुछा,
‘वत्सʼ कितना निर्माण कर लिया?
मैने कहा,प्रभु निर्माण !
कृष्ण बोले, भविष्य की योजनाओं का `वत्सʼ
मैंने कहा,हाँ प्रभु वो नौकरी में उन्नति,
बच्चों की पढाई, उनकी नौकरी फिर उनकी शादी, पत्नि की तबियत,घर की ई एम आई, फिर रिटायरमेंट के बाद के भविष्य की योजना ओर
‘रुको – रूको वत्स ,
क्यों मुझसे मेरा काम छिन रहें हो, भविष्य की सारी योजनायें तुम ही बना लोगे तो मैं क्या करूँगा ?
मुझसे मेरा काम मत छीनो।’
तभी अलार्म की आवाज़ से नींद खुली, तो देखा
तकिये पलंग के नीचे गिरें पडें थे,सामने दीवार पर लगी तस्वीर में कृष्ण बांसुरी बजाते हुए, मन्द- मन्द मुस्कुरा रहे थे ,मानो मुझसे कह रहे हो, तुम अपना कर्म करो, भविष्य की चिंता करके अपने शरीर ओर आत्मा को क्यो बीमार बना रहे हो, योजनायें बना कर, अपना समय क्यो व्यर्थ कर रहे हो,
आखिर होगा तो वही जो मैं चाहता हूँ ।
बाहर बैठक में रेडियो पर पत्नी जगजीत सिंह
का भजन सुनते हुए ,गुनगुना रही थी ।
हे, कृष्ण गोपाल हरी
हे, दीन दयाल हरी
हे, कृष्ण गोपाल हरी
हे, दीन दयाल हरी…

अनिता शर्मा ✍️

मेरे चिरप्रेमी

मेरे चिरप्रेमी प्रियतम,
मिलन वियोग के तुम्हारे खेल से,
मुक्त मुझें तुम अब कर दो,
तुम ही तो सच्चे साथी मेरे ,
हर जन्म साथ निभाते हो,
डरते है जग में सभी तुमसे,
मृत्यु कह कर सम्बोधन है करते,
लेकिन तुम तो जीवात्मा का,
नव जीवन से पूर्व ,
विगत शरीर की स्मृतियों व पीड़ाओ से मुक्त ,
कुछ समय का शान्तिपूर्ण विश्राम हो,
चुपके से इस बार ना आना,
आने से पहले बतला देना,
बार -बार जिंदगी से मिलन,
करा मेरा तुम ,
मोह, माया के धागों से बांध,
विरह दुख देते हो,
बहुत हुईं मनमानी तुम्हारी ,
हठ अब तुम मेरा देखोगे ,
मैं बांधूगी तुमको अपने,
मोहपाश में ऐसे कसके,
मिलन,विरह का खेल तुम्हारा ,
अब ना चल पायेगा,
उस दिन तुम आना
रात चादँनी हो जिस दिन,
सावन की शीतल हवा चले,
नभ तारों से सजा रहे,
मैं स्वागत में श्रृंगार दुल्हन सा कर,
झिलमिल तारों की ओढ चुनर,
फूलों से राह तेरी सजा दूंगी,
ना व्याधि होगी तन में,
ना व्यथा रहेगी जीवन की मन में,
द्वेष,क्लेश ना होगा दिल में,
होठों पे मिलन के गीत सजाये,
नेह व ममता के बंधन,
मोह अभिलाषाओ को छोड,
बाहुपाश में तेरे आऊंगी,
संग तेरे चलने पहले,
देह से जुडे ,
नेह ओर ममता के रिश्तों को,
पल भर निहार कर,
निर्मोही बन संग तेरे चलूगी,
देख मिलन ऐसा हमारा,
चकवा भी जल जायेगा,
चिरमिलन की गाथा हमारी,
झूम-झूम,
अम्बर संग तारे भी गायेगे।

अनिता शर्मा

अगम्य पथ

कैसे छिपा कर
सबके सामने
अपनो से उनके प्रिय को
छीन ले जाता है
अगम्य पथ पर कौन
हम सभी चल रहें
बढ रहे बेखबर से
हर पल हर क्षण
और पास और पास
अगम्य पथ की और ।

अनिता

पारखी

पारखी होता तो
परख लेता मुझको
पत्थरों में से ढूंढ लेता
मिट्टी में ना खोने देता
तराश देता जो मुझको
प्यार विश्वास से
काँच ना मिला होता
हीरा तुमने पाया होता।

काल कौन सा हैं ये आया

हे अभयंकर हे महाकाल
यह बात मुझें बतला दो
काल कोन सा हैं ये आया
ताडंव क्या ये तेरा हैं
सृष्टि के संहार का
या आसुरी शाक्ति हैं कोई
महामारी कोरोना जिसने फैलायी
मृत्यु का हैं नाच नचाया
या कोई मानवता के विरोधी
कर दुरूपयोग विज्ञान का
विनाश भारी हैं यह फैलाया
या प्रकृति ने रुष्ट हो अपने दोहन से
रोष दिखाया है अपना
अंतिम संस्कार को तरसे अपनो से
लाशों के हैं अम्बार लगे
अस्थियाँ भी विसर्जित होने का
है कर रही इंतजार
ऐसा समय कभी ना आया
जैसा हम आज देख रहे हैं
सपने में भी ना सोचा था
ऐसा भी हो सकता है
भय कैसा फैला हैं ये
इंसान-इंसान से ही नहीं
खुद को छूने से भी हैं डरा
सुने पडे हैं प्रार्थना स्थल
मंद पड़ी गति जीवन की
थमी भागदौड़ है सबकी
कोहराम मचा हैं भारी
फैला कैसा भय ये हैं
हे अभंयकर हे महाकाल
ये बात मुझें बतला दो
काल कोन सा हैं ये आया
हे अभंयकर हे महाकाल।

– अनिता शर्मा ✍

सत्य पराजित नहीं

सुना है कि सत्य पराजित नहीं होता है,
परेशान हो सकता है,
पर धर्य को धारण करना होता है,
कोन किसका सहारा,
किसका अवलम्ब,
सहारा जब चुक जाता है,
फिर विशवास कोन जगाये,
धर्य की एक सीमा रेखा भी होती है,
जब धर्य टूटने लगता है,
उसे सबंल किसका है मिलता,
चुक जाता है विश्वास,
टूट जाते हैं सब अवलम्ब,
फिर विश्वास कोन जगाये,
कि सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं,
अटल है विश्वास,
विचलित नहीं है आस,
तब ही कृष्ण का मिलता साथ,
टूट जाते है दुनियां के सब झंझावत,
विजयी हो जाता है सत्य,
मन को फिर से होता है विश्वास
सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं ।

विश्वास 👫🏻

समय बदलता है
यही विश्वास है मन में
घोर निराशा के बाद
जीवन में नव उमंगो को बिखेरता
आशा का सवेरा
जरूर आता है
समय बदलता है
यही विश्वास है मन में ।
पतझड़ की वीरानगी के बाद
हरियाली बिखेरतीं बहारे
प्रकृति को नव पल्लवित कर
सजाने जरूर आती है
समय बदलता है
यही विश्वास है मन में ।
गहन अंधकार के बाद
उज्जवल सूर्य की किरणें
प्रकाशित जीवन को करने
अंधकार के गर्त से
जरूर आती है
समय बदलता है
यही विश्वास है मन में ।
विनाश के बाद
नव निर्माण करने
कोई सृष्टि रचियता
जरूर आता है
समय बदलता है
यही विश्वास है मन में ।
मृत्यु के शोक के बाद
नव जीवन के आगमन से
सुख व प्रसन्नता
जरूर आती है
समय बदलता है
यही विश्वास है मन में ।
असत्य की विजय के बाद
सत्य को विजय दिलाने वाला
कोई कृष्ण
जरूर आता है
समय बदलता है
यही विश्वास है मन में ।

-अनिता