करवा चौथ पर्व

🌕🌛🌟🌟🌟🌜🌕
पावन प्रेम का पर्व,
पति सगं पत्नी का,
जीवन की आपाधापी में ,
खोये प्रेम के पलों को
फिर याद दिला,
जताने, संजोने का,
मांग में दमकता सिंदूर ,
माथे पे बिंदिया की चमक,
मंगलसूत्र की स्वर्णमयी आभा,
हाथों में चूड़ी की खन-खन ,
हथेली में मेहंदी की लाली ,
पैरों में पायल व बिछिया की छम-छम,
लाल साड़ी में शोभा सौंदर्य की,
सौभाग्य आजीवन यह बना रहे,
करवा चौथ के चाँद सा चमकता,
चेहरा साजन का सदा रहे,
देख कुमुदिनी की तरह,
तन- मन सजनी का खिला रहे ।
⭐💖🌜🌝🌛🌕🌜🌝🌛💖⭐
🌕करवा चौथ की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ🌕
🌜🌝🌛

-अनिता शर्मा

नवरात्रा रो त्योहार

🌷🌷🌷🌷🌷
आयो री सखी, नवरात्रा रो त्योहार ,
घर आंगणै पधारेगी ,आपणै प्यारी अम्बे माँ ।
उमंग,उत्साह मन में घणों रे भरो,
सत्कार स्वागत री करो तैय्यारी ।
आयो री सखी नवरात्रा रो त्योहार,
घर आंगणै पधारेगी, आपणै प्यारी अम्बे माँ ।

घर द्वार नें संवार ल्या,फूला री झालर बणावा,
आंगण बुहार ,चोखा माडंना बणावा,
रोली,मौली धूप ,दीप ,अक्षत सू थाल ने सजावा।
आयो री सखी नवरात्रा रो त्योहार,
घर आंगणै पधारेगी ,आपणै प्यारी अम्बे माँ ।

घट में सरस पाणी भर ,गंगा रो नीर मिलावा,
लाल चुनर उड़ार, श्रीफल ने सजावा ,
माटी रा कुंडा में जौ बौआ,घट स्थापित कर ,
अखंड जोत दीवड़ा में, जोड़ा ।
आयो री सखी नवरात्रा रो त्योहार,
घर आंगणै पधारेगी, आपणै प्यारी अम्बे माँ।

खीर, पुआ,सीरा रो भोग लगावा,
श्रृद्धा सू मैंया की करा आरती,
मगंलगीत सुवावणा गावा री सखी,
अम्बे माँ ने रिझावा।
आयो री सखी नवरात्रा रो त्योहार ,
घर आंगणै पधारेगी, आपणै प्यारी अम्बे माँ ।

माँ सू करा, हाथ जोड़ अरज या सब,
ज्यौं-ज्यौं ज्वारा बढें, त्यौं-त्यौं घर-संसार में,
आनंद घणों रे बढें ,सुमति,भक्ति माँ की सबने मिले,
महामारी रो त्रास, सारा जग स मिटे।
आयो री सखी नवरात्रा रो त्योहार,
घर आंगणै पधारेगी आपणै प्यारी अम्बे माँ ।

🙏🏻🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
माँ भवानी अम्बे की कृपा आप और आपके परिवार पर सदा बनी रहे, आप सभी स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहें ।
नवरात्रा के मंगलमय,भक्तिमय व शक्तिमय पर्व की
हार्दिक शुभकामनायें 🌷🌷🙏🏻😊

-अनिता

स्तुति



माँ 🙏🏻
🌷🌷🌷🌷🌷🌷
मातेश्वरी तू धन्य हैं, मातेश्वरी तू धन्य है।
कहता कोई सीता तुझें,कहता कोई तू शक्ति है,
कहता कोई तू है प्रकृति,कहता कोई आसक्ति है,
कहता कोई राधा तुझें,कहता कोई अनुरक्ति है
तू सर्वरूपा प्रेमियों के प्राणधन की भक्ति है,
तेरे अमित उपकार के आनंद अनुभव जन्य है,
मातेश्वरी तू धन्य है मातेश्वरी तू धन्य है।
तू कुटिल कली दल के लिए कुलिश मूर्ति करालिका,
हरि हर विमुख नर के लिए कृत्या तू ही है कालिका ,
तू वैष्णवी है वैष्णवों के कंठ तुलसी मालिका,
तू प्रभु पदाश्रित जीव की प्रत्येक पल पल पालिका,
तू ब्रह्म जीव मिलाप की सदग्रंथ सुदृढ़ अनन्य है,
मातेश्वरी तू धन्य है मातेश्वरी तू धन्य है ।
तू कर्म योगी के लिए सत्कीर्ति की परम ललाम,
तू ज्ञानीयों की अटल श्रद्धा मानसिक विश्राम है,
तू ध्यानीयों की शक्ति पूर्ण समाधि है सुखधाम है,
तू दामिनी से ही सुशोभित बिंदुमय घनश्याम है,
तेरा उपासक जो नहीं वो जीव कृतध्न है,
मातेश्वरी तू धन्य है मातेश्वरी तू धन्य है ।
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

लेखक–अज्ञात

रहस्य ये सुलझा दो तुम 🙏🏻

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
क्षीर सागर में योग निद्रा में लीन,
हैं लीलाधर रहस्य ये सुलझा दो तुम, 🙏🏻
रहस्य ये सुलझा दो तुम 🙏🏻
सृष्टि की रचना,पालन व संहार सब हाथ तुम्हारे ,
खेल अपने प्रमोद हेतु है क्या ? ये स्वयं तुम्हारा,
पंच तत्व से निर्मित माटी की ये देह,
खेल तुम्हारा खिलाड़ी हम ,
निर्णायक तुम विजेता, पराजित हम,
सृष्टि रगंमच तुम्हारा, पटकथा तुम्हारी,
कठपुतलियाँ हम सूत्रधार हो तुम ,
नचाते जैसा, वैसा नाचे नाच हम,
काम, क्रोध, मद,लोभ,मोह, ईर्षा व रोग धागें तुम्हारे,
फँसते,उलझते व सुलझाते,
सुखी-दुखी, हँसते-रोते हम,
एक पत्ता भी नही हिलता,
कहते बिन मर्जी तुम्हारे ,
पात्र तुम्हारे फिर कैसे ?
भागी बनते पुण्यों और पापों के,
सृष्टि के रगंमच में पात्र निभाते,
आगे के संवादों, भूमिका से अनभिज्ञ है रहते,
आज, कल,परसों, बरसों की रख सोच है जीते,
माया कैसी तुम्हारी भरोसा नहीं अगले ही पल होने का,
भूलावें में रहें शाश्वत रहने का,
जानबूझ के रहे सत्य से परे,
पात्र निभाते सृष्टि के रगंमच से ,
भूमिका कब हो जाएगी समाप्त ,
अनभिज्ञ रह जीते सभी,
आना-जाना गर होता अधिकार हमारे,
जन्म-मृत्यु के चक्र में हम उलझते ?
सृष्टि में हम क्या ? आते जाते ,
क्षीर सागर में योग निंद्रा में लीन,
है लीलाधर रहस्य ये सुलझा दो तुम,🙏🏻
रहस्य ये सुलझा दो तुम ।🙏🏻

🌷🌷अनिता शर्मा

योगनिद्रा का अर्थ

वो तेरी चाय की प्याली

🌷🌷☕☕☕☕🌷🌷
1–🌼यादों के झरोखों से 🌼
🌷🌷🌷🌷🌷
सच में बहुत याद आती है,
राधिका तुम और तुम्हारी चाय,
एक कप चाय सिर्फ चाय नहीं होती,
बहाना मेल-मिलाप का ही नहीं,
यादगार पलों की कहानी होती है,
हिस्सा खट्टें – मीठें किस्सों का होती हैं,
बहुत कुछ सीखने व जानने का जरिया,
बहुत कुछ पाने व देने का जरिया,
चाय की प्याली बन जाती है,
माना कई वर्ष गुजर गये लम्हों को बीते,
अंकित है मानस पटल पर आज भी,
राधिका तुम और तुम्हारी चाय,
नया शहर,अनजान लोग, परेशान था मन,
हाँफ बर्थ डे का केक बिटिया का आयी थी देने,
बगल वाले घर में रहती बताया था तुमने,
कुछ बातें हुई घर आने को बोला था तुमने,
एक शाम मैं घर आयी तुमने चाय पिलाई थी,
वो चाय कितनी ही मुलाकातों का हिस्सा बन गयी,
जैसा नाम वैसा ही निश्छल प्रेम है तुम्हारा,
शाम की अधिकांश चाय साथ तुम्हारे होने लगी,
बडी बहन सा अधिकार,छोटी बहन सा प्यार जताना,
बच्चों ने मौसी, बुआ सा अपनापन तुमसे पाया,
चाय फिर अकेली कहाँ रही,
समोसा, जलेबी की दावत संग,
शर्मिला, टिम्सी,सोमी,रश्मी को भी जोड गई,
समोसा,जलेबी की पार्टी, बच्चों के संग तुम्हारी मस्ती
वो मनुहार कर नाश्ते की पूरी प्लेट खाली करवाना,

सर्दियों की गुनगुनी धूप में,

कच्चा-पक्का अमरूद साथ में खाना,

आज भी देख अमरूद याद आता हैं,
तुम्हारा अपनापन, शरारत,मीठी मुस्कान व हँसी,
प्रार्थना हैं ईश्वर से सदा बनायें रखे ,
सच में बहुत याद आती हैं,
राधिका तुम और तुम्हारी चाय ।

🌼🌼🌼☕☕ 🌼🌼🌼 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 -अनिता शर्मा


कहाँ जा रहे हैं हम

कहाँ जा रहें हैं,कहाँ जायेंगे,
ज्वलंत समस्या हैं ये,
रूक कर चिन्तन गम्भीर ,
अब हमें करना होगा,
महत्वपूर्ण ईकाई समाज की,
कगार पे टूटने की,
कब के टूटे संयुक्त परिवार,
कगार पर एकल परिवार,
आधुनिकता, भोगवादी विचारधारा, पाश्चात्य संस्कृति, पैसा और पैसा कमाना सिखाने वाली मूल्यहीन शिक्षा, युवाओं को भटकाते,आदर्शहीन,मूल्यहीन,नशा,
लिव इन रिलेशनशिप की,वकालत करते चलचित्र,
कैसे परिवार,कैसा समाज,देश,
कुछ समय बाद होगा,
प्रश्न चिन्ह लगा है ये,
चिन्तन हमें अब होगा करना,
भूल कहाँ हुई है, हमसे,
कहाँ है चूके हम,बदल रहा सब,
बदलाव गर ऐसा रहा,
भविष्य होगा क्या ? भावी पीढ़ीयो का ,
क्या बदलाव ये, बदलता नारी स्वरूप है ,
घर, परिवार,रिश्तों को संवारती,
सहनशीलता की मूर्ति,
कुछ सदियों से शोषित ,अपमानित पुरूषों से हुई, पारिवारिक कार्यो को गौण मान,महत्व ना समझा,
बुद्धिहीन ,अबला मान पग-पग,अत्याचार किये ,
शिक्षित हो नारी ने,आर्थिक निर्भरता पायी आज,
पुरूषों के संग, समान काम करती नारी,
पैसा ,पदोन्नति, स्वयं का अस्तित्व महत्वपूर्ण हुआ,
पुरूष तत्व जागा उसका, नारी तत्व खोने लगा,
नारी के लिए घर,परिवार,प्रेम अब होने लगे गौण,
नानी,दादी,माँ जैसी भारतीय नारी,
अब कही खोने लगी,
दस,पंद्रह साल बाद कैसे होगे,
घर, परिवार ,समाज ,
चिन्तन हम सबको, अब करना होगा,
स्मरण फिर रखना होगा, करवाना होगा ,
विचारधारा हमारी संस्कृति ,परम्पराओ की,
सिया-राम सी, हो मर्यादा,
राधा-कृष्ण सा, प्रेम हो,
शिव-पार्वती सा साथ हो,
नर-नारी के जीवन में, इनका ही आर्दश रहे,
विवाह ओर सप्तपदी के वचनों का महत्व सदा रहे,
अस्तित्व परिवार,समाज,संस्कृति का बना रहेगा तभी,
सुरक्षित होगी भावी पीढ़ी,उत्थान तभी होगा देश का,

कहाँ जा रहे हैं, कहाँ जायेंगे,
ज्वलंत समस्या है ये,
रूक कर चिन्तन गम्भीर,
अब हमें करना होगा ।

अनिता शर्मा ✍️

सुविचार

व्यक्ति जब तक मर्यादा, नैतिकता, आदर्शो की डोर से बंधा रहता है,तब तक उसका जीवन पतंग की भाँति प्रगतिशील ओर ऊँचाईयों को छूता रहता है ।
व्यक्ति जब यह डोर तोड देता है, तो उसके जीवन का हश्र भी पतंग की ही भाँति होता है,जो डोर से टूटने के बाद कहाँ गिरेगी ओर किसके हाथों में होगी पता नहीं।

जय श्री कृष्णा

अनिता शर्मा✍️

तू चलता चल ( गीत )

विश्वास का दामन,थामे रख,तू चलता चल,
तू थकना नहीं, तू रूकना नहीं ,
जीवन है, चलने के लिए, तू चलता चल,
तू बहता चल,तू चलता चल,

1 माना ये रात है, काली, गहरी अंधियारी,
तू मन में भर ,उमंगो का सागर ,
सुबह का सूरज, फिर आयेगा,
नई आशायें,सपने संजोये,
जीवन के सवेरो में, रंग नये तू भरता चल,
तू चलता चल,

विश्वास का दामन, थामे रख, तू चलता चल,
तू थकना नहीं, तू रुकना नहीं,
जीवन है, चलने के लिए, तू चलता चल,
तू बहता चल,तू चलता चल,

2 संधर्ष जीवन में आते है, आते ही रहेगे,
तू तान के सीना ,जो,खडा रहेगा ,
वो कुछ ना ,तेरा कर पायेंगे,
मुश्किलों को तू , पराजित कर,
विजय तू अपने, जीवन में, लिखता चल,
तू चलता चल,

विश्वास का दामन थामे रख, तू चलता चल,
तू थकना नहीं, तू रुकना नहीं ,
जीवन है, चलने के लिए , तू चलता चल,
तू बहता चल, तू चलता चल,
तू चलता चल ।


अनिता शर्मा

सुविचार

इंसान की नियति ईश्वर निर्धारित करते हैं
यह सत्य है , मगर
इंसान अपने ही अच्छे-बुरे कर्मो से
स्वयं उसका निर्धारण करवाते हैं ।

जय श्री कृष्णा 🙏🏻

कृष्णमयी राधा (गीत)

कान्हा,तू जा,तू जा,मैं,तोसे देख,बोलू ना,हाँ,मैं,बोलू ना,
साँझ,सवेरे,करता है, मुझे तगं, ऐसे,साँवरे से मैं,कुछ भी बोलू ना,कान्हा,तू जा,तू जा।
1. राधा है,कृष्ण की,कृष्ण है,राधा का,रे ,
कहता है,मैं ये बोल दू ,चाहता है,मैं ये बोल दू ,
करता है, जोरी मुझसे,कभी जाता,रूठ रे,
कभी मीठी- मीठी, बातों से रिझाता है, मुझें,
अरे,ऐसे कैसे मैं, लाज का पट खोल दू ,
कान्हा,तू जा,तू जा,मैं,तोसे देख,बोलू ना,
हाँ, मैं बोलू ना ।
2. तेरी साँवली,सलोनी छवि,नैनो में ऐसी बसी,
यमुना के तीर पे, गोकुल की गलियों में,
कदंब के पेड़ तले,कुंज लताओ में,
गय्या के झुंड में, ग्वालों की टोली में,
हर जगह तेरी ही छवि, दिखती है रे,साँवरे,
कान्हा,तू जा,तू जा, मैं,तोसे देख, बोलू ना,
हाँ,मैं, बोलू ना ।
3. तेरी बांसुरी की सुन के धुन,सुध-बुध मैं भूली रे
मन का मेरे चैन गया,हियाँ का रे सुकून रे ,
तेरे प्रेम में हुई मगन,हँसती,कभी मैं गाती हूँ,
गोपियों संग पनघट जा,खाली गागर,ले मैं,आती हूँ ,
कहने लगे गोकुल के लोग, तेरी राधा हुई बावरी,
कान्हा,तू,जा,तू,जा, मैं,तोसे देख,बोलू ना,
हाँ,मैं, बोलू ना, हाँ,कान्हा तेरी राधिके,तोसे, बोले,ना,हाँ बोले ना।
-अनिता शर्मा