आईना

आईने ने पूछा आज कई दिनों बाद,
कैसी हो,
मुस्कुरा कर अक्स बोला,
मैं– मैं ठीक हूँ ,
पलकों में छिपी बूंदों को देख,
आईने कहा,
तन का दर्द तो ज़िम्मेदारी निभाने में, कब से छिपा लिया करती हो–
तारीफ करनी पड़ेगी,
आज दिल का दर्द छिपाने की, कारीगरी भी बखूबी सीख गई हो—
                              अनिता शर्मा✍

वैराग्य

वैराग्य सदैव क्या—
कुछ पाने की चाह का शमन
मोह से मुक्त होना —
या जीवन में उपजा
कामनाओं ओर इच्छाओं की
अतृप्ति का असंतोष नहीं —-
                अनिता शर्मा✍

दर्द

दिल कांच सा होता नाजुक ,
सुनते आयें ,
दरक कर दर्द से ,
टूट हैं जाता ,
किरचें चुभने सा दर्द,
बार-बार होता महसूस ,
टुकड़े  बिखरे बाहर ,
पर कहीं दिखते नहीं ……
                           अनिता शर्मा ✍

दास्तान जिंदगी की

जिंदगी पहेली सी
रास्ते सीधे होते ही कहाँ
आड़ी -टेड़ी कई घुमावदार राहें 
आसान कहाँ होती 
सभी के संधर्ष हैं अपने
रास्तों में होते
खूबसूरत मकाम
कुछ और पाने की
मंजिल पर पहुचने की धुन
जीवन्त पलों की खुशी
महसूस करने की
दिल को इजाजत ही कहाँ देती
तय सफर के बाद भी
सुकून के चंद लम्हों को
गुजारने की मोहलत
किसी-किसी को ही
धडकनों की सौगात
तकदीर की मेहरबानी से
जिंन्दगी से मिलती ।

                                 ✍️ अनिता शर्मा

संसार

तुम चैन की बंसी बजा रहे
योग निंद्रा में लीन
मंद-मंद मुस्कुरा रहे देख
अपनी माया से रचे संसार में
माया के बंधनों में उलझते-सुलझते
हँसते-रोते,भ्रमित व व्यथित
अपने माटी के खिलौनों को
यथार्थ नहीं कुछ यहाँ
विकारों, कामनाओं
आशा -निराशा
सुख-दुःख
मिलना – बिछड़ना
खोना – पाना
तृष्णा, अपेक्षाओं
मोहजाल से रचा संसार
सोयी चेतना बुनती
अपना फिर भी स्वप्न संसार ।

                               अनिता शर्मा ✍

दिल

प्यार भरे दिल को
किसी के
इस कदर भी ना तोड़िये
जोड़ना हो नामुमकिन
धडकनें देख रूकी
दिल से तुम्हारे
आह ये निकले
ये तो मेरा ही हिस्सा था ।

                            अनिता शर्मा ✍

विचारमाला [धन ]

जीवन को सुंदर व सुख सुविधाओ से युक्त बनाने के लिए व्यक्ति धन अर्जित कर उसे अपना गुलाम बनाना चाहता हैं,
पर कुछ व्यक्तियों को धन अपना ही गुलाम बना लेता हैं ओर वह सम्पन्न होते हुए भी
विपन्नता से रहते हुए अप्रसन्नता व खिन्नता में अपना जीवन व्यतीत करते हैं ।

                                     अनिता शर्मा ✍

विचारमाला


       🕉
          लोग भी कैसे-कैसे होते हैं
          अपनी विपरीत परिस्थितियों
          का दोषारोपण ईश्वर व दूसरों
          पर कर देते हैं,   
          अपने कर्मो व व्यवहार
          को भूल,स्वयं को
          निर्दोष व बेचारा दिखाते हुए
         सहानुभूति पाने के लिए
         गिरगिट सा रंग बदलने की
         कला में महारत हासिल
         रखते हैं 🕉

अनिता शर्मा ✍️

जिंदगी की किताब

जिन्दगीं की किताब के
हर पन्ने पर
मैंने “तुम” लिखा हैं
गर फुर्सत दे वक्त
तुम देख लेना
खाली मिलें गर
किसी पन्ने का कोई कोना
तुम “मैं” लिख देना ।
                          अनिता शर्मा ✍

जय सोमनाथ

हे शिव शंकर
आलौकिक मंदिर ये तेरा
पल में भूलूँ
इस जग को
पा दर्श तेरा ।

मंदिर हैं ऐसा
आँखे मन भर
दर्श तेरा कर पायें
ह्रदय आनन्द से भरे अपार
श्रवण कर आरती
रोम-रोम हो पुलकित
शहनाई की सुंदर धुन
अहसास कराती
तुझसे दूर होने का
कुछ पल
आत्मसाक्षात्कार पा
शरीर से विलग होने का अहसास
शरीर की नश्वरता
आत्मा की अनंत यात्रा
मैं कौन, क्यों ,कब से कब तक
प्रश्नों के उत्तर
क्या हैं छुपा रहस्य यहाँ
जाग्रत हो सुप्त चेतना यहाँ
बहते अश्रु अविरल
रोकती भरभस
पा संसार का भान
कोई समझे ना मिथ्या
जग में तेरे मैं दुःखी
कृपा अगिनत
हे शिव शंकर
तेरी हैं मुझपर
अहसास होना
पिता रूप में
हर पल साथ
माँ शक्ति संग
तुम मेरे रहते
सम्पदा ये मेरी
है जग में सबसे बड़ी

हे शिवशंकर
आलौकिक मंदिर ये तेरा
पल में भूलूँ
इस जग को
पा दर्श तेरा ।
                 अनिता शर्मा ✍