समय

समय की रफ्तार बहुत तेज हैं
कब  साथ अपने बहा ले जाए
दूसरो को गलतियों की दे दो माफी
अपनी गलतियों की मांग लो माफी
समय ये मौका कल दे या ना दे
हमें या आपको
गिले-शिकवे आज ही मिटा दीजिए ।
                   
                                   अनिता शर्मा ✍

सिद्धांत

सिद्धांतो पर चलना हर युग में ,
माना मुश्किल है, पर नामुमकिन नहीं ।

अफ़सरशाही व्यवस्था का,
कुछ स्वेच्छा से बन हिस्सा,
लालच के दल-दल में डूबें,
कुछ,आत्मन को मार,
चलते सगं उसके,
कुछ, सही ना कर पाने वाले,
कुंठित हैं बनते,
कुछ मजबूरी में हिस्सा बन ,
सही-गलत का खोते विवेक,
आदर्शों, मूल्यों से निर्मित सिद्धांत,
माँ-बाबा के पोषण में घुट्टी बन ,
खून की बूंद-बूंद में बहते,
भौतिक सम्पदा से नहीं ,
सत्कर्मों,सत्कार्यो से ,
अच्छा इंसान बनने की नसीहत ,
मेहनत से हासिल मुकाम को,
सिद्धांतो के लिए छोड़ देना,
कुछ करने की अपार क्षमता को क्षीण कर जीना,
सुरक्षित भविष्य को छोड़ ,
असुरक्षित भविष्य की ओर चलना,
बिरले ही कर पाते हैं ,
राह मे साथ कदम मिलाकर चलने वाला, दिखता नहीं ,
पर दूर कही कुछ ओर भी है जो चल रहें,
अच्छाई व बुराई हर युग में होती ,
अनुपात अलग-अलग,
अनुपात से ही स्वर्ग-नर्क सी बनती दुनिया ,
अच्छाई का अनुपात कम होने पर भी,
अस्तित्व दुनिया का उसी पे है स्थिर ,
हैं दुनिया बदलने की क्षमता उसमें ,

सिद्धांतो पर चलना हर युग में ,
माना मुश्किल है,पर नामुमकिन नहीं ।

                                  अनिता शर्मा ✍

माँ🌷🌷

अंबा का प्रतिरूप
लौकिक रूप में माँ
अस्तिव समाये बच्चों में
धरा पर धरा सी रहती माँ

शक्ति का ज्योति पुंज घर में
मंदिर है घर आपसे ही माँ
मूरत ममता व स्नेह भरी
पालक पिता संग अन्नपूर्णा माँ
लक्ष्मी व सरस्वती स्वरूपा
शक्ति स्त्रोत्र हम सभी का माँ ।

उमंग,उत्साह से भरी
निर्मल,निस्वार्थ बहती नदी माँ
जीवन की धूप में
पेड़ की शीतल छाँव माँ
छोटे से आँचल में
ममता का सागर समाये माँ ।

माथे की बडी सी बिंदिया से
सूर्य सा उजास घर में भरती माँ
मांग की सिन्दूरी रेखा से
मर्यादा समझाती माँ
पायल की रूनझुन से
नीरसता खंडित करती माँ ।

अपना ना कोई सुख-दु:ख उनका
बच्चों के सुख-दुःख से सुखी -दुःखी होती माँ
बच्चों के दुःख का पूर्वाभास करती
आवाज़ सुन सुख-दुःख का अहसास करती माँ
व्रत व प्रार्थनाओ में बच्चों की खुशियाँ मागती
तपस्वी व दानी समान माँ ।

अंबा का प्रतिरूप
लौकिक रूप में माँ
अस्तिव समाये बच्चों में
धरा पर धरा सी रहती माँ।
-अनिता शर्मा ✍

सुविचार

मित्र व जीवन साथी का महत्व
हमारे जीवन में कृष्ण पक्ष व
शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की भाँति हैं।
सदाचारी व सुविचार रखनें
वाला मित्र व जीवन साथी
जीवन को शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की भाँति
उन्नति व प्रकाश की ओर लेकर जाता है ।
दुराचारी व कुविचार रखने वाला मित्र
व जीवन साथी जीवन को कृष्ण पक्ष के चंद्रमा की भाँति अवनति व अंधकार की ओर ।
                           
                              अनिता शर्मा ✍

लोरी

आजा री निंदिया, आजा री निंदिया,
मेरी गुड़िया की आँखियो में,
आजा री निंदिया,आजा री निंदिया,
मेरी बिटिया की अँखियों में,
मेरी सोना की अँखियों में ।

निंदिया रानी आ के मेरी सोना को,
परियों के देश में ले जा,
परिया झूला- झूलाये जहाँ ,
ममता की छाँव दे वो अपनी ।

आजा री निंदिया ————-

निंदिया रानी आ के मेरी गुड़िया को,
चंदा मामा के घर ले जा,
चंदा, तारों संग मेरी बिटिया,
आँख मिचोली खेले वहाँ ।

आजा री निंदिया———–

निंदिया रानी आ के मेरी सोना को,
ऐसे जहान में ले जा ,
फूल ही फूल हो जहाँ ,
कांटे गम के ना हो वहाँ ।

आजा री निंदिया  —————-

निंदिया रानी सुबह सवेरे को,
मेरी बिटिया को मम्मा, पास से ले आना,
ठुमक-ठुमक कर गुड़िया मेरी,
मम्मा की गोद आ जायेगी ।

आजा री निंदिया, आजा री निंदिया ,
मेरी गुड़िया की अँखियों में,
मेरी सोना की अँखियों में,
मेरी बिटिया की अँखियों में ।
                                 अनिता शर्मा ✍

प्रार्थना

हम सब तेरे बालक हैं माँ
हमको शरण लगा लेना
हमको शरण लगा लेना माँ
तव चरणों में जगह देना
हम सब——–
कलि काल का असुर धनेरा है
माँ चारों तरफ अंधेरा है
हमको ज्योति दिखला देना
माँ हमको राह बता देना
हम सब————
संसार समुद्र गहरा है माँ
नहीं यहाँ कोई रहवर है
पग पग फैले है भंवर
हमको भंवरों से बचा लेना
हम सब———-
तुम विशवेशवरी हो माता
जगदम्बा तुम ही कहाती हो
कष्टों में घिरे जो बालक तेरे
तु उनके कष्ट मिटा देना
हम सब————
दो हमको आशीष हे माँ
सदा तव चरणों में ध्यान रहे
यावत रहें सूर्य चन्द यहाँ
इस संसार में तेरा गुण गान रहे
हम सब तेरे बालक है माँ
हमको शरण लगा लेना
हमको शरण लगा लेना माँ
तव चरणों में जगह देना ।

अनिता शर्मा ✍

स्वामी विवेकानंद जी के विचार

जननी ही शक्ति का प्रथम विकासस्वरूप है, और जनक के भाव की अपेक्षा जननी  का भाव ही उच्चतर हैं । ‘ माँ ‘ नाम लेने से ही शक्ति का भाव सर्वशक्तिमता और देवी शक्ति का भाव आ जाता है।
जैसे शिशु अपनी माता को सर्वशक्तिमता समझता है ,अर्थात माँ  सब कुछ कर सकती हैं । वह जगज्जननी भगवती ही हमारी आभ्यन्तरिक निद्रिता कुण्डलिनी हैं।उनकी उपासना किए बिना हम कभी भी अपने को पहचान नहीं सकते ।

सर्वशक्तिमता, सर्वव्यापिता ओर अनंत दया उन्हीं जगज्जननी भगवती के गुण हैं । जगत में जितनी शक्ति हैं, उसकी समष्टि स्वरूपिणी वही हैं। जगत में शक्ति की सभी अभिव्यक्तियाँ माँ ही हैं। वही प्राणरूपणी हैं,वही बुद्धिरूपिणी हैं,वही प्रेमरूपिणी ।

वह समस्त जगत के भीतर विराजमान हैं , फिर भी वह जगत से संपूर्ण पृथक हैं ।
वह एक व्यक्तिरूप हैं, उनको जाना जा सकता हैं व देखा जा सकता हैं। ( जैसे श्री
रामकृष्ण ने उनको जाना और देखा था । ) उन जगन्माता के भाव में प्रतिष्ठित होकर हम जो चाहे कर सकते हैं ।वह तुरंत ही हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देती हैं ।
” हमारी पार्थिव जननी में उन जगन्माता का जो एक कण प्रकाशित रहता हैं, उसी की उपासना से महानता का लाभ होता हैं ।
यदि परम ज्ञान और आनंद चाहते हो तो उस जगज्जननी माता की उपासना करो ” ।

नवरात्रा के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ

नन्ना की ट्रेन (बाल-गीत)

नन्ना की ट्रेन चली,
छुक, छुक, छुक ,
मम्मा बोली, रुक ,रुक ,रुक ,
मैं भी तेरे साथ चलूँगी ,
अकेले नहीं जाने दूँगी ,
  नन्ना बोला,
नहीं-नहीं मम्मा ,
मैं अकेले ही जाऊँगा ,
नानी के घर जाऊँगा ,
लड्डू ,पेड़ा खाऊँगा ,
नाना से मिलूँगा, नानी जी से मिलूँगा ,
मामा से मिलूँगा मामी जी से मिलूँगा,
मौसी से मिलूँगा मौसा जी से मिलूँगा,
भैया से मिलूँगा दीदी से मिलूँगा,
फिर जल्दी से मैं अपने ,
घर वापस आ जाऊँगा ,
नन्ना की ट्रेन चली ,
छुक, छुक, छुक,
पापा बोले, रुक, रुक, रुक,
मैं भी तेरे साथ चलूँगा ,
अकेले नहीं जाने दूँगा ,
नन्ना बोला ,
नहीं, नहीं, पापा ,
मैं अकेला ही जाऊँगा ,
दादी के घर जाऊँगा ,
हलवा , पूरी खाऊँगा,
दादी से मिलूँगा,दादा जी से मिलूँगा ,
ताऊ जी से मिलूँगा ताई जी से मिलूँगा ,
बुआ से मिलूँगा, फूफा जी से मिलूँगा ,
भैया से मिलूँगा दीदी से मिलूँगा,
फिर जल्दी से मैं अपने,
घर वापस आ जाऊँगा ,
नन्ना की ट्रेन चली,
छुक, छुक, छुक,
मम्मा बोली, रुक, रुक, रुक,
पापा बोले, रुक ,रुक ,रूक
नन्ना की ट्रेन चली ,
छुक, छुक, छुक ।
                          अनिता शर्मा ✍

क्या कोई (गीत)

क्या कोई सच में ,ऐसा-ऐसा,भी कर सकता है,क्या ,
क्या कोई सच में ,ऐसा – ऐसा भी कर सकता है, क्या कोई ,उम्मीदों को, नये से नये से ,
पंख दे सकता है, क्या,
क्या कोई सच में—————

1    क्या कोई,
खट्टी-कड़वी ,फीकी -फीकी, सी बातों में ,
रसगुल्ले सा,रस ,भर सकता है,क्या
क्या कोई सच में —————-

2  क्या कोई ,
टूटे – बिखरे, बेरंग से ,
सपनों में सतरंगी से,
रंग भर सकता है, क्या,
  क्या कोई सच में————-

3   क्या कोई
काली गहरी, अंधियारी रातों में,
दीपक बन ,उजियारा ,
दिखला सकता है,क्या,
क्या कोई सच में———

क्या कोई सच में,ऐसा-ऐसा भी, कर सकता है,क्या,
क्या कोई ,उम्मीदों को ,नये से नये से ,
पंख दे सकता है क्या ,
हाँ ,हाँ  वो, तुम ही,तो,हो,तुम ही,तो हो,
जो सच में ऐसा-ऐसा भी ,कर सकते हो ।

                                          ✍अनिता शर्मा

दीप अपना जलाए रखना

दीप अपना जलाए रखना ,
विश्वास अपना बनाए रखना ,
भटकें हुए को राह दिखाने का,
कर्तव्य अपना निर्वाह करते रहना,
दीप अपना जलाए रखना ।

संस्कृति, आस्था, मूल्यों, व आदर्शों को ,
मिट्टी के साँचे में सजाये रखना ,
अंधकार गहन है ,
चमचमाती तेज रंगीन रोशनियों,
आधुनिकता की चकाचौंध के अँधियारे में ,
खोये हँसेगे तुम पे,
विपरीत हवा बुझाने की कोशिश पुरजोर करेंगी ,
तुम अंगद से पैर जमाये रखना ,
कीट-पतंग की तरह कुछ ग्रास बन,
रंगीन रोशनियों में लुप्त हो जायेगें ,
चकाचौंध चुभने लगेगी जब त्रास बन,
लोट कर कुछ वापस आना चाहेंगे,
शांति व प्रसन्नता पाने ,
राह भटको को रोशनी दिखलाते रहना,
देख तुम्हें संकुचित मंदिम दीप ,
विश्वास से भर जगमगा जायेंगे,
दूर होगा गहन अंधकार ,
संस्कृति, आस्था, मूल्यों व आदर्शों के दीपों से,
रोशन होगी धरा ,

दीप अपना जलाए रखना,
विश्वास अपना बनाए रखना
भटकें हुए को राह दिखाने का
कर्तव्य अपना निर्वाह करते रहना ,
दीप अपना जलाए रखना ।

                                  ✍अनिता शर्मा